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मामला अध्ययन (केस स्टडी)

गरीबों के लिए वित्तीय सेवाएं: भारत

प्रस्तावना

बिल और मेलिंडा गेट्स द्वारा

ग़रीबी केवल पैसे की कमी नहीं होती। यह उन बुनियादी वित्तीय सेवाओं तक पहुंच की कमी भी है जो ग़रीबों को उनके पास मौजूद पैसे से अपनी जिन्दगियों को बेहतर बनाने में मदद करती है।

इसलिए विकासशील समुदाय कई दशकों से वित्तीय समावेश को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं—जिसका अर्थ है, लगभग 2 बिलियन ऐसे लोगों को बैंक खातों और क्रेडिट और बीमे जैसी सेवाओं से जोड़ना जो पूरी तरह से औपचारिक वित्तीय प्रणाली से बाहर रहते हैं। समस्या यह है कि, किसी भी पैमाने पर इसे करना अत्यंत महंगा रहा है।

अब तक। मोबाइल फोनों के साथ, वित्तीय सेवाओं के साथ ग़रीबों तक पहुंचने के लिए इसके विस्तार की व्यवस्था आसान और सस्ती है। उन लोगों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है जिनके पास बैंक खाते हैं, और हम इस प्रभाव को देखना शुरू कर रहे हैं। विशेष रूप से, इस बात के रोमांचक नये सबूत मौजूद हैं कि भुगतान और बचत जैसी डिजिटल वित्तीय सेवाएँ वास्तव में लोगों को ग़रीबी से उबरने में मदद करती हैं।

भारत डिजिटल वित्तीय समावेश के निर्माण के ब्लॉकों में निवेश करने के बारे में विशेष रूप से अभिनव रहा है। आधार, एक राष्ट्रव्यापी बायोमैट्रिक्स पहचान प्रणाली, ग़रीब लोगों के लिए बैंकों के साथ व्यापार करने को आसान और अधिक सुरक्षित बनाती है। भारत के नियामकों ने नए नियम लागू किये हैं जो विभिन्न प्रकार की सेवाएँ प्रदान करने के लिए वित्तीय संस्थानों को बेहतर लचीलापन प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, बैंकों का एक नया वर्ग, जिसे भुगतान बैंक कहा जाता है, जो नये निजी क्षेत्र के खिलाड़ियों को बाज़ार में लाया और लाखों नए खाते खोले। 2014 में, सरकार ने ग़रीबों को बड़ी मात्रा में खाते खोलने में मदद करने के लिए PMJDY नामक एक कार्यक्रम की शुरुआत की, और इसने हाल ही में इन खातों के माध्यम से उन तक फायदे पहुंचाना शुरु किया है।

विकासशील समुदाय की एक परिकल्पना यह भी है कि इस समावेश से महिलाओं के लिए विशेष रूप से क्रांतिकारी आ सकती है जिन्हें पारंपरिक रूप से आर्थिक निर्णय लेने से बाहर रखा गया है। अब, अनुसंधानकर्ता इसका परीक्षण करना शुरु कर रहे हैं। पिछले साल, तनवीर सूरी और विलियम जैक द्वारा केन्या में एक लैंडमार्क अध्ययन ने वित्तीय समावेश और महिलाओं के सशक्तिकरण के बीच एक स्पष्ट कड़ी को सिद्ध किया। इस साल, रोहिणी पांडे और उनके सहकर्मियों ने सबूत के आधार पर शानदार परिणामों को जोड़ा है। मेलिंडा ने डॉ. पांडे से उनके अनुसंधान के बारे में बात की, कि वित्तीय समावेश भारतीयों और भारत के लिए क्या कर सकता है, और प्रगति को कैसे तीव्र किया जाए।

भारतीय महिलाओं द्वारा वेतन/मजदूरी सीधे अपने खाते में प्राप्त करने का प्रभाव
सालाना आमदनियाँ
नियंत्रण समूह
13,479 INR
उपचार समूह
16,766 INR
स्वयं की आमदनी से खरीदें
नियंत्रण समूह
2%
उपचार समूह
13%

बातचीत करते हुए

मेलिंडा गेट्स

उपाध्यक्ष, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन


रोहिणी पांडे

मोहम्मद कमाल, सार्वजनिक नीति के प्रोफेसर, हार्वर्ड कैनेडी स्कूल

मेलिंडा: भारतीय महिलाओं के लिए वित्तीय समावेश पर आपका अध्ययन कौन सी समस्या को सुलझाने की कोशिश कर रहा है?

रोहिणी: जैसे-जैसे भारत संपन्न हो रहा है, महिलाएँ अब औपचारिक श्रम बल में कम काम कर रही हैं। यह महिलाओं के लिए एक समस्या है, क्योंकि जब वे नौकरी नहीं करती तो उनके पास घरेलू मामलों में बोलने की कम क्षमता होती है, और आम तौर पर अपनी पसंद के जीवन को पूरी तरह से जीने का मौका भी। यह भारत के लिए भी एक समस्या है, इससे बहुत सी ऐसी महिलाएँ जो काम करना चाहती हैं, उनकी प्रतिभाओं से लाभ लेने में विफल रहता है।

मेलिंडा: भारत में महिलाएँ काम करना क्यों कम कर रही हैं?

रोहिणी: एक ज़रूरी कारण—और ऐसा जिस पर हमारा अनुसंधान ध्यान केन्द्रित करता है—वे सामाजिक नियम हैं जो महिलाओं की गतिशीलता को रोकते हैं। बहुत सी भारतीय महिलाओं को घर से बाहर निकलने के लिए अनुमति लेने की जरूरत होती है। घर के बाहर काम करने को शर्मिन्दगी की तरह देखा जा सकता है। ये नियम केवल महिलाओं पर ही नहीं थोपे जाते। कुछ स्थानों पर, आदमियों को खराब प्रदाता माना जाता है यदि उनकी पत्नियाँ काम करती हैं। हम जानना चाहते थे कि क्या महिलाओं को वित्तीय प्रणाली से जोड़ना इन नियमों को पार करने में उनकी मदद करेगा। और शायद, समय के साथ-साथ, उन्हें बदलने भी लगे।

मेलिंडा: आपने अपने सिद्धांत का परीक्षण कैसे किया था?

रोहिणी: भारत सरकार हर ग्रामीण परिवार को 100 दिनों के काम की गारंटी देती है। यह एक आमदनी सुरक्षा कार्यक्रम है, जिसे कई बार काम के बदले आय (वर्कफेयर) भी कहा जाता है। परिवार इस बात के लिए विभाजन कर सकता है कि कौन काम करता है, जैसा भी वे चाहे, लेकिन ऐतिहासिक रूप से मजदूरी का भुगतान घर के मुखिया को किया जाता है, वास्तविक कार्यकर्ता को नहीं। इसलिए, आमतौर पर, आदमी ही अधिकतर पैसे को अपने पास रखते हैं और फैसला करते हैं कि उसे कैसे खर्च किया जाए। हम यह देखना चाहते थे कि क्या होगा यदि महिलाओं के काम के लिए मजदूरी सीधे उनके खातों में जाए जिसे वे स्वयं नियंत्रित करती हैं।

मेलिंडा: आपने सबसे अधिक दिलचस्प बात क्या सीखी थी?

रोहिणी: वे महिलाएँ जिन्होंने अपने स्वयं के खातों में मजदूरी प्राप्त की, उन्होंने ज़्यादा कमाया और ज़्यादा बचत की। दिलचस्प बात यह थी कि उन्होंने न केवल सरकार के वर्कफेयर कार्यक्रम में अधिक काम किया; बल्कि उन्होंने निजी क्षेत्र में भी अधिक काम किया। इस हस्तक्षेप के बाद, जब हमने महिलाओं से उनके काम के बारे में पूछा, तो उनके "गृहिणी" कहने की बजाय "कर्मचारी" कहने की संभावना अधिक थी। यह सशक्तिकरण की कहानी का सुझाव देता है। एक बैंक खाता होने और उसका उपयोग करने ने उनकी खुद के प्रति भावना को बदल दिया, या स्वयं के प्रति भावना को व्यक्त करने की उनकी क्षमता को बदल दिया।

मेलिंडा: आप यह अध्ययन करने में सक्षम हो पाईं क्योंकि भारत ने डिजिटल वित्तीय सेवाओं में निवेश किया है। किस तरह से डिजिटल प्रौद्योगिकी वित्तीय समावेश को सुगम बनाती है?

रोहिणी: डिजिटल ने बैंकिंग के तरीके को बदल दिया है और इसे ग्रामीण क्षेत्रों के ग़रीबों तक पहुंचने के लिए सस्ता बनाया है। ग़रीब लोगों की आमदनी बहुत कम होती है और उनका लेन-देन बहुत जल्दी-जल्दी होता है—ये दोनों बातें जिन्होंने परंपरागत रूप से बैंकों के लिए पैसा अर्जित करना मुश्किल बनाया। हालांकि, अब आपके पास सेवा मशीन वाले एक स्थान पर केवल एक व्यक्ति है जो गाँव के एक कमरे में बैठ सकता है और बैंक का काम कर सकता है। डिजिटल ने लागत को काफी हद तक कम किया है। साथ ही, जिस गतिशीलता की कमी की हमने बात की थी, उसके कारण बैंकिंग को गाँवों के पास लाना महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

मेलिंडा: जबकि भारत वित्तीय समावेश के लिए अपने प्रयासों की ओर बढ़ता है, देश को किस बात पर ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत है ताकि वह विशेष रूप से महिलाओं पर इसके प्रभाव को अधिकतम बना सके।

रोहिणी: डिजिटल बैंकों की यह दुनिया महिलाओं के लिए एक बहुत ही नई दुनिया है। हमारे अध्ययन से एक महत्वपूर्ण बात सामने आई कि महिलाओं को डिजिटल वित्तीय सेवाओं का उपयोग करने के लिए सुविधाजनक महसूस करवाने के लिए बहुत अधिक अतिरिक्त प्रशिक्षण की आवश्यकता है। याद रखें, चाहे आप एक डिजिटल दुनिया में रहते हैं, फिर भी आप इंटरनेट बैंकिंग की दुनिया में मौजूद नहीं हैं जहाँ आपके पास एक स्मार्टफोन ऐप हो। यदि आपके पास एक फोन है और आपका बैंक सावधान है, तो उम्मीद है कि आपको एक SMS प्राप्त होगा जो आपको बताता है कि आपके खाते में पैसा कब आ गया है, या, ज़्यादा से ज़्यादा, नियमित आधार पर एक SMS जो आपको बताता है कि आपके बैंक खाते में क्या मौजूद है। जबकि वास्तव में, होता क्या है कि वह SMS आम तौर पर तब भेजा जाता है जबकि आपका खाता पर्याप्त रूप से बड़ा हो, और यही तो है जो हम नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि छोटे से छोटे खाते वाले लोगों को अधिकतम जानकारी प्राप्त हो, जिनके सबसे दूर होने की संभावना है। यदि आपके पास एक डिजिटल प्रणाली है तो पारदर्शिता आसान है, लेकिन आपको उसमें निवेश करना पड़ता है।

मेलिंडा: आप ऐसी क्या बात देखती हैं जो आपको भविष्य के बारे में सबसे अधिक आशावादी बनाती है?

रोहिणी: पीढ़ी दर पीढ़ी बदलाव। जब आप इस समय एक गाँव के किसी बैंक में जाते हैं, तो जिन लोगों को आप वहाँ खड़ा पाते हैं, वे स्कूली बच्चे हैं। किशोर लड़कियाँ इस वित्तीय प्रणाली के साथ अच्छे से परिचित हैं। आप सुन सकते हैं कि बैंक का टैलर (रोकड़िया) शिकायत कर रहा होता है कि वे हमेशा एक समय पर एक रुपया डाल रही होते हैं, और टैलर वास्तव में ऐसा करना नहीं चाहता पर वह न भी नहीं कह सकता।

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